परा विद्या प्रदर्शन
यत् तदद्रेश्यमग्राह्यमगोत्रमवर्णमचक्षुःश्रोत्रं तदपाणिपादम्। नित्यं विभुं सर्वगतं सुसूक्ष्मं तदव्ययं यद्भूतयोनिं परिपश्यन्ति धीराः ॥ ६ ॥
वह जो अदृश्य, अग्राह्य, अगोत्र, अवर्ण और चक्षुःश्रोत्रहीन है, इसी प्रकार अपाणिपाद, नित्य, विभु, सर्वगत, अत्यन्त सूक्ष्म और अव्यय है तथा जो सम्पूर्ण भूतोंका कारण है उसे विवेकी लोग सब ओर देखते हैं ॥ ६ ॥
शब्दार्थ
- यत् — जो
- तत् — वह
- अदृश्यम् — आँखों से न देखा जा सकने वाला
- अग्राह्यम् — इन्द्रियों से ग्रहण न किया जा सकने वाला
- अगोत्रम् — जिसका कोई गोत्र, वंश या उत्पत्ति नहीं है
- अवर्णम् — जिसका कोई रंग, रूप या वर्ण नहीं है
- अचक्षुः — जिसके भौतिक नेत्र नहीं हैं
- श्रोत्रम् — जिसके भौतिक कान नहीं हैं
- तत् — वही
- अपाणि-पादम् — जिसके भौतिक हाथ और पैर नहीं हैं
- नित्यम् — सदा रहने वाला, शाश्वत
- विभुम् — सर्वव्यापक, अनेक रूपों में विद्यमान
- सर्वगतम् — जो सब जगह व्याप्त है
- सुसूक्ष्मम् — अत्यन्त सूक्ष्म
- तत् — वही
- अव्ययम् — जिसका कभी नाश या क्षय नहीं होता
- यत् — जो
- भूतयोनिम् — समस्त प्राणियों और सृष्टि का मूल कारण
- परिपश्यन्ति — भली-भाँति देखते (साक्षात्कार करते) हैं
- धीराः — विवेकी, ज्ञानी, तत्त्वदर्शी पुरुष
सरल भावार्थ
वह परम ब्रह्म आँखों से दिखाई नहीं देता, इन्द्रियों से पकड़ा नहीं जा सकता, उसका कोई गोत्र, जन्म, रंग या रूप नहीं है। उसके भौतिक नेत्र, कान, हाथ और पैर नहीं हैं। वह नित्य, सर्वव्यापक, अत्यन्त सूक्ष्म, अविनाशी तथा सम्पूर्ण सृष्टि का मूल कारण है। उस ब्रह्म का तत्त्वदर्शी और विवेकी महापुरुष सर्वत्र साक्षात्कार करते हैं।
दार्शनिक संकेत
इस मंत्र में ब्रह्म के प्रमुख गुण बताए गए हैं—
- निर्गुण-निराकार — अदृश्य, अवर्ण, अगोत्र।
- इन्द्रियातीत — अचक्षुः, अश्रोत्र, अपाणिपाद।
- शाश्वत — नित्य, अव्यय।
- सर्वव्यापक — विभु, सर्वगत।
- अत्यन्त सूक्ष्म — जिसे सामान्य इन्द्रियाँ नहीं जान सकतीं।
- सृष्टि का मूल कारण — भूतयोनि।
- अनुभवगम्य — धीर (ज्ञानी) पुरुष उसका प्रत्यक्ष साक्षात्कार करते हैं।

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