यथोर्णनाभिः


यथोर्णनाभिः सृजते गृहते च यथा पृथिव्यामोषधयः सम्भवन्ति। यथा सतः पुरुषात्केशलोमानि तथाक्षरात्सम्भवतीह विश्वम् ॥ ७ ॥

​जिस प्रकार मकड़ी जालेको बनाती और निगल जाती है, जैसे पृथिवीमें औषधियाँ उत्पन्न होती हैं और जैसे सजीव पुरुषसे केश एवं लोम उत्पन्न होते हैं उसी प्रकार उस अक्षसे यह विश्व प्रकट होता है।

शब्दार्थ

  • यथा — जिस प्रकार
  • ऊर्णनाभिः — मकड़ी
  • सृजते — रचती है, उत्पन्न करती है
  • गृह्णते — समेट लेती है, अपने में वापस ले लेती है
  • — और
  • यथा — जैसे
  • पृथिव्याम् — पृथ्वी में, पृथ्वी से
  • ओषधयः — औषधियाँ, वनस्पतियाँ
  • सम्भवन्ति — उत्पन्न होती हैं
  • यथा — जैसे
  • सतः — जीवित, सजीव
  • पुरुषात् — पुरुष से, जीवित मनुष्य से
  • केश — सिर के बाल
  • लोमानि — शरीर के रोम
  • तथा — उसी प्रकार
  • अक्षरात् — अविनाशी ब्रह्म से
  • सम्भवति — उत्पन्न होता है
  • इह — यहाँ, इस संसार में
  • विश्वम् — सम्पूर्ण जगत, समस्त सृष्टि

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