तपसा चीयते ब्रह्म ततोऽन्नमभिजायते । अन्नात्प्राणो मनः सत्यं लोकाः कर्मसु चामृतम् ॥ ८ ॥"
हिंदी व्याख्या:
तप (ज्ञान) के द्वारा ब्रह्म में उपचय (स्थूलता या विस्तार) होता है।
उसी से अन्न उत्पन्न होता है।
फिर अन्न से क्रमशः प्राण, मन, सत्य, लोक, कर्म और कर्मों से अमृत के समान फल उत्पन्न होते हैं।
तपसा — तप से, ज्ञानमय तप से, सृजन-संकल्प रूप तप से
चीयते — विकसित होता है, विस्तार को प्राप्त होता है, उपचित होता है
ब्रह्म — हिरण्यगर्भ (सृष्टि का प्रथम प्रकट स्वरूप) अथवा ब्रह्म से प्रकट सृष्टि का कारण
ततः — उससे, उसके बाद
अन्नम् — अन्न, स्थूल भौतिक पदार्थ, प्रकृति का पोषक तत्त्व
अभिजायते — उत्पन्न होता है
अन्नात् — अन्न से
प्राणः — प्राण, जीवन-शक्ति
मनः — मन
सत्यम् — सत्य; यहाँ पाँच महाभूतों अथवा स्थूल जगत के सत्य स्वरूप का भी बोधक माना गया है (भाष्य-परंपरा के अनुसार)
लोकाः — विभिन्न लोक
कर्मसु — कर्मों में, कर्मों के द्वारा
च — और
अमृतम् — अमर फल; अर्थात् कर्मों से प्राप्त होने वाले पुण्यफल, जो निश्चित अवधि तक बने रहते हैं
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